बहुत दूर से…

बहुत दूर से आधी रात तेरी मेरी आहट सुनके खिड़की पे आया है बादल का शॉल ओढ़े आधे मन से चाँद..

कागज़ पे..

कागज़ पे तुझे उतारते हुए जब लफ्ज़ पूरे नहीं पड़ते मैं बैठा देता था इक तितली कि नज़्म मुक्कमल हो जाये.. आज लेके बैठा हूँ सब कुछ कागज़ का आसमां स्याही का समंदर लफ़्ज़ों की क्यारी फिर भी ये नज़्म है कि मुकम्मल नहीं होती अब तुम ही कहीं से ढूंढ लाओ तितली कोई..

इक शोर सा था सुबह सुबह..

इक शोर सा था सुबह सुबह, मेरे बरामदे में इक दुनिया है इक घर है इक घोंसला है नए मेहमान आये हैं वहाँ हम खेला करेंगे अब उड़ना भी सीखेंगे साथ में मगर सुना है परिंदों के मुल्क पर हमला हुआ है कागज़ी परिंदे घुस आये है वहां भी कुछ मासूम मारे गए हैं.. दर-ब-दर…

वो शायर…

वो शायर जो लफ़्ज़ों के साथ खेलके बड़ा हुआ था.. मैंने सुना है कल शब् उसने खुदखुशी कर ली.. किसी किताब के बीच, एक मुड़े हुए पन्ने के अंदर लाश बरामद हुई है.. किताब के हर पन्ने पे बिखरा सहमा सा रंग बेहद चुप चुप है.. कुछ लफ्ज़ रो रहे हैं, कुछ फातेहा पढ़ रहे…

जैसे कभी घुट जाते हैं ..

जैसे कभी घुट जाते हैं काले बादल.. रौशनी जाने लगती है.. लगता है तूफ़ान थमेगा ही नहीं.. बहुत शोर होता है कि बस अब फट पड़ेगा.. मगर फिर देर तक एक बूँद नहीं बरसती.. कितना अजीब है ये मौसम.. तुम्हारे सीने का..

चलो दबे पाँव..

चलो दबे पाँव जाके बुझा आते हैं ये चाँद की लालटेन कि रौशनी चुभती होगी टिमटिमाती निगाहों में.. चलेंगे सिर्फ तुम और मैं.. सहम जाते हैं ज़रा सी भीड़ से ये.. बस ध्यान से कि कहीं क़दमों की आहट से उठ ना जाये.. दिन भर की धूप के बाद अभी अभी सोये हैं फुटपाथ पे…

कल अँधेरे में…

कल अँधेरे में यूँ हीं चलते चलते आसमां पर… ठोकर लग गयी थी पैर से.. चाँद के कटोरे को.. उछल के उस ओर जा गिरा.. एक कोना टूट के जाने कहाँ गया.. फिर हम दोनों समेटते रहे रात भर बिखरी हुई चांदनी.

“दीवानों की बस्ती में यूँ ढेर मिलते हैं, यहाँ ताज़ा पके मीठे शेर मिलते हैं..

“दीवानों की बस्ती में यूँ ढेर मिलते हैं, यहाँ ताज़ा पके मीठे शेर मिलते हैं.. अजीब हैं लोग दुनिया चख के लेते हैं, सुना था यहाँ शबरी के बेर मिलते हैं.. रंजिशें हो गयी कि इश्क़ में पड़ गये, आज कल वो यहाँ बहुत देर मिलते हैं.. मिलता है शब् भर तेरे ख़्वाबों का शहद,…

इक और खिलौना..

“बचपन में याद है मुझे मिट्टी का खिलौना था मेरे साथ उठता मेरे साथ सोता हँसता तो हँसता रोता तो रोता उसके साथ वो सब होता जो मेरे साथ होता दिन भर लिए फिरता रहता था और कभी हाथ से गिरता रहता था.. इक दफ़ा जाने कैसे छूट गया टूट गया मिल गया वहीँ मिट्टी…